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भारत से चीता प्रबंधन के गुर सीखना चाहता है ईरान, RTI से हुआ आबादी में गिरावट का खुलासा

ईरान में चीता संरक्षण संकट के दौर से गुजर रहा है। वहां इन खूबसूरत जानवरों की संख्या तेजी से घट रही है, जिससे उन्हें विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। इसी चिंता को देखते हुए ईरान ने भारत में चल रहे चीता संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रमों से सीखने में रुचि दिखाई है।

भारत सरकार की चीता परियोजना संचालन समिति के प्रमुख राजेश गोपाल ने फरवरी में हुई एक बैठक में बताया कि ईरान के अधिकारियों ने औपचारिक बातचीत के दौरान भारत से चीता प्रबंधन की विधियों को समझने की इच्छा जताई है। राजेश गोपाल ने सुझाव दिया कि भारत के नेतृत्व वाली ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ के जरिए चीता संरक्षण में रुचि रखने वाले अन्य देशों को भी जोड़ा जा सकता है।

हालांकि, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि अभी तक ईरान की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव भारत को नहीं मिला है। भारत की “चीता पुनर्वास कार्य योजना” में पहले से यह प्रावधान है कि भारत, ईरान सहित वैश्विक संरक्षण समुदाय के साथ मिलकर संकटग्रस्त ईरानी चीतों की सुरक्षा के लिए सहयोग करने को तैयार है।

भारत में चीतों की वापसी

भारत में चीते 1950 के दशक तक विलुप्त हो चुके थे। अंतिम ज्ञात चीता 1948 में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के जंगलों में देखा गया था। भारत ने 1970 के दशक में ईरान के साथ एशियाई शेरों के बदले एशियाई चीते लाने की कोशिश की थी, लेकिन ईरान में चीतों की कम संख्या और आनुवंशिक समानताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत ने बाद में अफ्रीकी चीतों को लाने का निर्णय लिया।

सितंबर 2022 से भारत ने नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से कुल 20 अफ्रीकी चीते मंगवाए हैं – नामीबिया से आठ और दक्षिण अफ्रीका से बारह। अब भारत बोत्सवाना से दो चरणों में आठ और चीते लाने की योजना बना रहा है, जिनमें से पहले चार मई 2025 तक भारत पहुंच सकते हैं।

ईरान में संकट में हैं चीते

ईरानी अधिकारियों और संरक्षण संगठनों के अनुसार, 2010 में ईरान में करीब 100 चीते थे, लेकिन 2022 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 12 रह गई। 1970 के दशक में 400 से अधिक एशियाई चीते ईरान के पूर्वी और मध्य हिस्सों में फैले हुए थे। हालांकि 1960 के दशक में कानूनी संरक्षण मिलने के बावजूद, चीतों को अपने शिकार की कमी, निवास स्थान के क्षरण और खंडित होने, मानव-वन्यजीव संघर्ष और सामाजिक-राजनीतिक अशांति के चलते अस्तित्व संकट का सामना करना पड़ा है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि चीतों के मौजूदा आवास क्षेत्रों में खनिज संसाधनों की प्रचुरता और ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने आर्थिक तंगी पैदा की है, जिससे अवैध शिकार की घटनाएं बढ़ी हैं। इन सभी कारणों से ईरान में चीतों के लिए जीवन बेहद कठिन होता जा रहा है।

भारत की पहल और अनुभव ईरान जैसे देशों को चीता संरक्षण की दिशा में नई उम्मीद दे सकते हैं, बशर्ते अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रतिबद्धता मजबूत हो।

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