विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने हालिया यूरोप यात्रा के दौरान कई संवेदनशील मुद्दों पर भारत का पक्ष स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने न सिर्फ अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसे को लेकर उठे सवालों का जवाब दिया, बल्कि आतंकवाद, रूस-यूक्रेन युद्ध, और चीन के प्रति वैश्विक कंपनियों के नजरिए पर भी दो टूक बात की। जयशंकर से जब पूछा गया कि क्या भारत डोनाल्ड ट्रंप पर भरोसा करता है, तो उन्होंने जवाब दिया कि भारत का दृष्टिकोण “व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित” पर केंद्रित है। उन्होंने कहा, “हम दुनिया को जैसी है, वैसी स्वीकार करते हैं। हमारा मकसद हर उस रिश्ते को मजबूत करना है जो भारत के हित में हो। अमेरिका के साथ संबंध हमारे लिए बेहद अहम हैं, पर यह किसी एक व्यक्ति या राष्ट्रपति की बात नहीं है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन और भारत के बीच सीमा पार आतंकवाद जैसे मसलों पर कई बार असहमति देखी गई है। जयशंकर ने यूरोपीय देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आतंकवाद को सिर्फ भारत-पाक मसला मानकर अनदेखा करना खतरनाक सोच है। उन्होंने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी का उदाहरण देकर आतंकवाद को लेकर पश्चिम की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा भारत-पाक संघर्ष को लेकर दिखाई गई ‘नैतिक समानता’ पर विदेश मंत्री ने तीखी प्रतिक्रिया दी। यूरोपीय मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत किसी पक्ष में नहीं है, लेकिन युद्ध को समस्या का हल भी नहीं मानता। हम नहीं मानते कि युद्ध से समाधान निकलेगा। हम रूस के साथ भी रिश्ते रखते हैं और यूक्रेन के साथ भी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत का रुख उसके ऐतिहासिक अनुभवों और
भू-राजनीतिक हितों पर आधारित होता है। जयशंकर ने कहा कि अब यूरोप की कई कंपनियां भारत को निवेश के लिए प्राथमिकता दे रही हैं, क्योंकि वे चीन से दूरी बनाना चाहती हैं। डेटा और सप्लाई चेन को लेकर कंपनियों की सोच बदल रही है। वे अब सिर्फ दक्षता नहीं, भरोसे और सुरक्षा को भी तरजीह दे रही हैं। अंत में संदेश स्पष्ट: भारत अब ‘फॉलोवर’ नहीं, ‘निर्णायक’ की भूमिका में जयशंकर के पूरे संवाद से साफ होता है कि भारत अब अपने विदेशी रिश्तों में आत्मनिर्भर सोच के साथ आगे बढ़ रहा है — जहां व्यक्ति नहीं, नीतियां और राष्ट्रीय हित तय करते हैं कि किससे कितनी करीबी रखनी है। यह संवाद भारतीय विदेश नीति के उस नए आत्मविश्वास को दर्शाता है जो दुनिया को भारत की प्राथमिकताओं के हिसाब से देखने को मजबूर कर रहा है।

