बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चरम पर है। इस बार मैदान में हैदराबाद के सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की हुंकार। ओवैसी ने बिहार में इंडिया ब्लॉक के साथ मिलकर बीजेपी-एनडीए को रोकने की बात कही है, लेकिन साथ ही उन्होंने वोटर लिस्ट की जांच को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल भी उठाए हैं।
बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखें भले ही अभी घोषित न हुई हों, लेकिन सियासी गलियारों में हलचल तेज हो चुकी है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी का मकसद है बीजेपी-एनडीए को सत्ता में आने से रोकना। उन्होंने न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में कहा कि उनकी पार्टी इंडिया ब्लॉक के साथ गठबंधन के लिए तैयार है, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो AIMIM अकेले दम पर भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी।
ओवैसी ने ये साफ कर दिया कि उनकी पार्टी सिर्फ सीमांचल तक सीमित नहीं रहेगी। AIMIM ने पहले ही दो विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, और उनका प्लान सीमांचल के बाहर भी अपनी ताकत दिखाने का है। लेकिन रुकिए, ओवैसी का ये बयान भी कम गूंज पैदा नहीं कर रहा कि वो पांच साल पहले से ही महागठबंधन के नेताओं से बात करने की कोशिश कर रहे हैं। हम नहीं चाहते कि बीजेपी-एनडीए बिहार में सत्ता में आए। लेकिन ये उन पर निर्भर है, वो अपना फैसला लेने के हकदार हैं। जो पार्टियां सत्ता चाहती हैं, उन्हें अब जागना चाहिए। मरने के बाद रोना बेकार है। अभी होश में आओ, अभी जिंदा रहने की कोशिश करो। हम पूरी ताकत से चुनाव लड़ेंगे।”
ओवैसी का ये बयान तो सियासी मैदान में आग लगाने वाला है। लेकिन उनकी ये बात भी गौर करने लायक है कि AIMIM के बिहार अध्यक्ष अख्तरुल ईमान लगातार महागठबंधन के साथ गठजोड़ की कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी ने ये भी बताया कि पांच साल पहले उन्होंने संसद में महागठबंधन के दो सांसदों से इस बारे में बात की थी। लेकिन सवाल ये है कि क्या RJD और कांग्रेस जैसी पार्टियां AIMIM को अपने साथ लेंगी, या फिर ओवैसी को अकेले ही मैदान में उतरना पड़ेगा?
ओवैसी ने बिहार में वोटर लिस्ट की जांच को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि ये जांच “बैकडोर NRC” यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को चुपके से लागू करने की कोशिश है। ओवैसी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा कि ये प्रक्रिया कानूनी रूप से संदिग्ध है और इससे लाखों गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग वोट देने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

