बिहार में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है। ऐसे वक्त में एक बड़े संस्थान द्वारा कराए गए सर्वे ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। इस सर्वे में जनता ने अपनी राय खुलकर रखी है और बताया है कि किस दल को फायदा होता दिख रहा है और किसे गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सर्वे में यह साफ़ नजर आया कि बिहार की जनता इस बार परंपरागत जातीय राजनीति से हटकर विकास और रोजगार जैसे मुद्दों को तरजीह दे रही है।
बेरोजगारी और नौकरियों की कमी सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर सामने आया।
मंहगाई और महंगाई से जुड़ी परेशानियां, खासकर खाद्य वस्तुओं और पेट्रोल-डीजल के दाम।
कानून-व्यवस्था, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे।
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत पर भी जनता ने नाराज़गी जताई।
सर्वे में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि राज्य में सत्ता समीकरण पूरी तरह से बदलने की ओर बढ़ सकता है।
सत्ता पक्ष को लेकर जनता के बीच नाराज़गी दिखाई दी है, खासकर युवाओं और शहरी वोटरों में।
विपक्ष को इस नाराज़गी का सीधा फायदा मिलता दिख रहा है, लेकिन जनता ने साफ़ किया कि केवल आलोचना भर से बात नहीं बनेगी। विकास का ठोस रोडमैप ही लोगों को आकर्षित करेगा।
नए और छोटे दल साइलेंट वोट बैंक में सेंध लगाते दिख रहे हैं। इनमें से कुछ सीटें बड़ी पार्टियों के लिए बेहद मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं।
सर्वे रिपोर्ट में यह भी उल्लेखनीय है कि पहली बार वोट देने वाले युवा और छात्र वर्ग इस बार चुनावी जंग का सबसे निर्णायक फैक्टर साबित हो सकते हैं। इनकी सबसे बड़ी मांग है जॉब के अवसर और बेहतर शिक्षा के हालात।
बिहार की राजनीति में हमेशा जातीय समीकरण का बड़ा असर रहा है। लेकिन इस बार जातियों से परे जाकर भी लोग मुद्दों के हिसाब से वोट डालने को तैयार दिख रहे हैं। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में अब भी जातीय रणनीतियां अहम रहेंगी।
सर्वे के अनुसार अभी तक के रुझान बताते हैं कि कोई भी दल चुनाव से पहले बहुत ज्यादा आराम की स्थिति में नहीं है। जनता ने नेताओं को साफ संदेश दिया है कि हवा-हवाई वादों से उन्हें भरोसा नहीं दिलाया जा सकता। राज्य की जनता ठोस काम और ईमानदार राजनीति चाहती है।

