दिल्ली-NCR में लगातार बिगड़ती हवा की गुणवत्ता पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि अब तक प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए उठाए गए सभी कदम पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि समस्या से निपटने के लिए तात्कालिक और अस्थायी उपायों से आगे बढ़कर लॉन्ग टर्म और ठोस नीति की जरूरत है, ताकि प्रदूषण में वास्तविक और स्थायी कमी लाई जा सके।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने वकीलों की भूमिका पर भी तीखा तंज कसा। उन्होंने कहा कि ऐसे गंभीर मामलों में विशेषज्ञों से कम सलाह ली जाती है और अक्सर वकील ही खुद को एक्सपर्ट समझने लगते हैं, जबकि समाधान वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण से होना चाहिए। कोर्ट ने माना कि दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।
बच्चों की सेहत को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिल्ली सरकार द्वारा स्कूल बंद करने और हाइब्रिड पढ़ाई की व्यवस्था को अस्थायी नीति करार दिया। बेंच ने कहा कि ये फैसले केवल जोखिम को कुछ समय के लिए कम करने के उद्देश्य से हैं और इन्हें स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस नीति में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे कदमों को सर्दियों की छुट्टियों के विस्तार की तरह देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस दौरान वैसे भी स्कूल 10 से 15 दिन बंद रहते हैं।
सुनवाई में वकील गुरुस्वामी ने गरीब बच्चों की स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने दलील दी कि पिछले वर्ष लगभग 85 प्रतिशत गरीब बच्चे स्कूल नहीं जा पाए, जिससे कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्कूल बंद होते हैं तो क्या यह सुनिश्चित किया जाता है कि गरीब बच्चों को भोजन मिले। उन्होंने कहा कि घर पर बैठकर बच्चों को सुरक्षित रखने की बात करना आसान है, लेकिन क्या गरीब परिवारों के पास वैक्यूम क्लीनर या अन्य साधन हैं, जिससे वे प्रदूषण से बच सकें। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब बच्चे पैदल स्कूल जाते हैं और वे प्रदूषण फैलाने वालों में शामिल नहीं हैं।
हाइब्रिड पढ़ाई को लेकर सीनियर वकील लूथरा ने तर्क दिया कि यह व्यवस्था 12वीं कक्षा तक लागू होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह मान लेना गलत है कि 16–17 साल के बच्चों की इम्युनिटी ज्यादा मजबूत होती है। इस पर एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि 15 दिसंबर को हालात बेहद गंभीर थे और बच्चों की जान खतरे में होने के कारण स्कूल बंद करने का फैसला लिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर अभिभावक बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं, तो उसमें भी जोखिम बना रहता है।
कोर्ट में यह मुद्दा भी उठा कि ऑनलाइन या हाइब्रिड पढ़ाई अमीर वर्ग के पक्ष में जाती है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब बच्चों को होता है। CJI सूर्यकांत ने माना कि संपन्न परिवार अपने बच्चों को किसी न किसी तरह सुरक्षित रख सकते हैं, लेकिन बाकी बच्चे अधिक जोखिम में रहते हैं, जिससे समाज में असमानता और भेदभाव बढ़ सकता है। कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि प्रदूषण से केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि बुजुर्ग और आम नागरिक भी गंभीर खतरे में हैं और पार्क जैसी सार्वजनिक जगहों पर जाना भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा से निपटने के लिए स्ट्रक्चरल सुधार और दीर्घकालिक रणनीति जरूरी है। इस मामले में अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी, जिसमें सरकारों से ठोस और प्रभावी कदमों पर जवाब मांगा जा सकता है।

