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उन्नाव रेप केस: हाई कोर्ट के आदेश से खुलासा, CBI की भूमिका से पीड़िता को झटका

उन्नाव रेप केस में पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा निलंबित किए जाने के फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इस बीच हाई कोर्ट के आदेश को ध्यान से पढ़ने पर यह भी सामने आया है कि मामले की जांच कर रही CBI (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) की भूमिका ने कई मौकों पर पीड़िता और उसके परिवार को निराश किया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पॉक्सो एक्ट (POCSO) की धारा 5(सी) और 6 के तहत दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक विधायक ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं होता, इसलिए इन धाराओं के तहत सेंगर को उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती। सीबीआई ने अदालत में दलील दी थी कि कानून की “उद्देश्यपूर्ण व्याख्या” की जानी चाहिए, लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट के आदेश से यह भी खुलासा हुआ कि वर्ष 2019 में जब पीड़िता के परिवार ने यह मांग की थी कि कुलदीप सिंह सेंगर पर आईपीसी की ज्यादा गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जाए, तब सीबीआई ने पीड़िता का साथ नहीं दिया। परिवार का तर्क था कि सेंगर एक पब्लिक सर्वेंट है और उस पर आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) और (के) के तहत आरोप तय किए जाने चाहिए थे। हालांकि, सीबीआई ने उस समय अदालत में कहा था कि पीड़िता द्वारा सुझाई गई अतिरिक्त धाराएं लागू नहीं होतीं।

इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 20 अगस्त 2019 को पीड़िता की याचिका खारिज कर दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में स्पष्ट रूप से नोट किया कि उस फैसले को न तो पीड़िता ने चुनौती दी और न ही सीबीआई ने उसका समर्थन किया। यही तथ्य अब मौजूदा फैसले की अहम कड़ी बन गया है।

हाई कोर्ट ने अंततः यह कहा कि कुलदीप सिंह सेंगर पर केवल पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत ही मुकदमा चल सकता है, जिसमें अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान है। कोर्ट ने यह भी माना कि सेंगर यह सजा पहले ही जेल में काट चुका है, इसलिए उसे इन धाराओं से राहत दी गई।

इस फैसले में ट्रायल कोर्ट की एक अहम टिप्पणी का भी जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया था कि सीबीआई के जांच अधिकारी ने निष्पक्ष जांच नहीं की, जिससे पीड़िता और उसके परिवार के मामले को नुकसान पहुंचा। ट्रायल कोर्ट ने इसे एक “अपरिहार्य निष्कर्ष” बताया था। पीड़िता के परिवार का आरोप है कि जांच सीबीआई को सौंपे जाने के बावजूद निष्पक्षता और ईमानदारी नहीं बरती गई।

पीड़िता के परिवार ने दिल्ली हाई कोर्ट को यह भी बताया कि सीबीआई के जांच अधिकारी ने कथित तौर पर कुलदीप सिंह सेंगर के साथ मिलकर काम किया, ताकि पीड़िता की उम्र से जुड़ा अहम सबूत सामने न आ सके। परिवार का दावा है कि जांच के दौरान सेंगर द्वारा तैयार किए गए झूठे और फर्जी दस्तावेजों को प्राथमिकता दी गई, जिससे केस कमजोर हुआ।

हालांकि, इन तमाम आरोपों के बावजूद यह भी एक तथ्य है कि सीबीआई की जांच के आधार पर ही ट्रायल कोर्ट में सेंगर को दोषी ठहराया गया था। इसके बावजूद, हाई कोर्ट के ताजा फैसले ने न सिर्फ पीड़िता और उसके परिवार को गहरी निराशा दी है, बल्कि जांच एजेंसी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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