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ब्रह्मोस का हाइपरसोनिक अवतार: 8500 किमी/घंटा की रफ्तार, S-400 और THAAD भी होंगे बेअसर

भारत अपने रक्षा तंत्र को लगातार और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल की मारक क्षमता ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा, जब कुछ ही मिनटों में पाकिस्तान के अत्यंत सुरक्षित नूर खान एयरबेस को गहरा नुकसान पहुंचाया गया। खास बात यह रही कि चीन निर्मित एयर डिफेंस सिस्टम तैनात होने के बावजूद पाकिस्तान को यह समझने तक का मौका नहीं मिला कि हमला कहां से हुआ।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक किसी भी ऑपरेशनल परिस्थिति में ब्रह्मोस मिसाइल को इंटरसेप्ट नहीं किया जा सका है। इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ब्रह्मोस की इंटरसेप्शन दर सैद्धांतिक रूप से शून्य है। मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह बात साबित हुई, जब Su-30MKI लड़ाकू विमानों से दागी गई ब्रह्मोस मिसाइलों ने सटीकता के साथ अपने लक्ष्य नष्ट किए। इसने युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी इसकी विश्वसनीयता को पुख्ता कर दिया।

अब इस मिसाइल को और घातक बनाने की दिशा में भारत बड़ा कदम उठाने जा रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, ब्रह्मोस का हाइपरसोनिक वर्जन (ब्रह्मोस-2) तेजी से विकसित किया जा रहा है। यह नई मिसाइल मैक 7 से भी अधिक, यानी करीब 8500–8600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरने में सक्षम होगी। इसके पहले परीक्षण की संभावना 2028 के आसपास जताई जा रही है, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मिसाइल अगले 20 से 30 वर्षों तक क्रूज़ मिसाइल युद्ध की परिभाषा बदल सकती है।

वर्तमान ब्रह्मोस की खासियत इसकी तेज़ गति, कम ऊंचाई पर उड़ान और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता है। यह मिसाइल मैक 2.8 से मैक 3 की रफ्तार से उड़ती है और इनर्शियल नेविगेशन व सैटेलाइट गाइडेंस के संयोजन के कारण इसे ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है। भारत और रूस के संयुक्त प्रयास से बनी इस मिसाइल की रेंज पहले 290 किलोमीटर थी, जिसे अब बढ़ाकर 450 से 900 किलोमीटर तक किया जा चुका है। इसे जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च किया जा सकता है।

वरिष्ठ अधिकारियों ने यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए बताया कि रूस की P-800 ओनिक्स मिसाइल, जिसे ब्रह्मोस का तकनीकी पूर्वज माना जाता है, पश्चिमी देशों के अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के बावजूद केवल लगभग 6 प्रतिशत मामलों में ही इंटरसेप्ट की जा सकी। यहां तक कि पैट्रियट जैसे आधुनिक सिस्टम भी ऐसी तेज़ और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली मिसाइलों को पूरी तरह रोकने में नाकाम रहे।

भविष्य को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि 2035 से 2040 तक भी ब्रह्मोस को रोक पाना दुश्मन देशों के लिए बेहद कठिन रहेगा। चाहे पाकिस्तान या चीन GaN आधारित AESA रडार, बेहतर सेंसर और तेज़ इंटरसेप्टर विकसित कर लें, तब भी अधिकतम 15–20 प्रतिशत मामलों में ही इंटरसेप्शन संभव हो पाएगा। इसके लिए भारी निवेश, तकनीकी विशेषज्ञता और जटिल सिस्टम इंटीग्रेशन की जरूरत होगी, जो निकट भविष्य में हर देश के लिए आसान नहीं है।

कुल मिलाकर, ब्रह्मोस और उसके हाइपरसोनिक संस्करण का विकास भारत को न सिर्फ सैन्य बढ़त दिला रहा है, बल्कि यह भी साफ संदेश दे रहा है कि देश की रक्षा तैयारियां आने वाले दशकों तक किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होंगी।

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