महात्मा गांधी पर 1922 में चला राजद्रोह का मुकदमा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक माना जाता है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भड़काया है। 10 मार्च 1922 की शाम ब्रिटिश पुलिस ने साबरमती आश्रम से महात्मा गांधी को गिरफ्तार किया। बताया जाता है कि गिरफ्तारी के समय भी गांधी शांत और मुस्कराते हुए थे और उन्होंने बिना किसी विरोध के खुद को पुलिस के हवाले कर दिया।
दरअसल, गांधी के खिलाफ कार्रवाई की वजह उनके द्वारा साप्ताहिक अखबार Young India में लिखे गए तीन लेख बने। इन लेखों में ब्रिटिश शासन की तीखी आलोचना की गई थी। इनमें 29 सितंबर 1921 का लेख “Tampering with Loyalty”, 15 दिसंबर 1921 का लेख “The Puzzle and Its Solution” और 23 फरवरी 1922 का लेख “Shaking the Manes” शामिल थे। ब्रिटिश सरकार का मानना था कि इन लेखों के जरिए गांधी लोगों में सरकार के प्रति असंतोष फैला रहे हैं और यह राजद्रोह की श्रेणी में आता है।
इस मामले की सुनवाई अहमदाबाद की अदालत में जज सी.एन. ब्रूमफील्ड की अध्यक्षता में हुई। सरकारी पक्ष की ओर से एडवोकेट जनरल जे.टी. स्ट्रांगमैन ने पैरवी की। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी भले ही अहिंसा की बात करते हों, लेकिन उनके लेखों और आंदोलनों से अराजकता फैल रही है। अभियोजन पक्ष ने यह भी दावा किया कि पिछले दो वर्षों से लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश की जा रही है और यह लेख उसी साजिश का हिस्सा हैं।
हालांकि मुकदमे के दौरान महात्मा गांधी का रुख सबको हैरान करने वाला था। उन्होंने आरोपों का खंडन करने के बजाय उन्हें स्वीकार कर लिया। गांधी ने अदालत में कहा कि उन्होंने जो कुछ लिखा, वह पूरी जिम्मेदारी और सोच-समझकर लिखा था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ लोगों में असंतोष पैदा करना अपराध है, तो वह इस अपराध को स्वीकार करते हैं। गांधी ने यह भी कहा कि उनके लिए यह अपराध नहीं बल्कि देश के प्रति उनका सर्वोच्च कर्तव्य है।
अदालत में दिए गए अपने बयान में गांधी ने ब्रिटिश शासन की कठोर आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस शासन ने भारत को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है और करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। उन्होंने जज से कहा कि अगर अदालत को लगता है कि यह कानून सही है, तो उन्हें अधिकतम सजा दी जाए। लेकिन अगर जज को लगता है कि यह कानून ही गलत है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
जब फैसला सुनाने की बारी आई तो जज सी.एन. ब्रूमफील्ड ने भी स्वीकार किया कि उनके सामने ऐसा अभियुक्त पहले कभी नहीं आया। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार उन्हें गांधी को अपराधी मानना पड़ेगा, लेकिन यह भी सच है कि वे करोड़ों भारतीयों के लिए एक महान नेता और देशभक्त हैं। इसके बावजूद अदालत कानून से बंधी हुई है, इसलिए दंड देना अनिवार्य है।
18 मार्च 1922 को अदालत ने महात्मा गांधी को राजद्रोह के आरोप में छह वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई। सजा सुनाते समय जज ब्रूमफील्ड ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में सरकार परिस्थितियों को देखते हुए सजा कम कर देती है, तो उन्हें सबसे अधिक खुशी होगी। गांधी ने इस फैसले को शांतिपूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि वे इस दंड को विनम्रता के साथ स्वीकार करते हैं।
सजा के बाद महात्मा गांधी को पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल भेज दिया गया। हालांकि स्वास्थ्य खराब होने के कारण 1924 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पूरी सजा पूरी होने से पहले ही रिहा कर दिया। इतिहासकारों के अनुसार यह मुकदमा केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ नैतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में राजद्रोह के दो मुकदमे विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पहला मुकदमा 1908 में बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ चला था और दूसरा 1922 में महात्मा गांधी के खिलाफ। दोनों मामलों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखे गए लेख ही कारण बने थे और दोनों को छह-छह साल की सजा सुनाई गई थी। हालांकि दोनों मुकदमों में एक बड़ा अंतर था—जहां बाल गंगाधर तिलक ने अदालत में अपने लेखों का बचाव किया, वहीं महात्मा गांधी ने आरोप स्वीकार करते हुए इसे अपना कर्तव्य बताया।
इतिहास में यह मुकदमा इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि महात्मा गांधी ने अदालत को ही ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ नैतिक संघर्ष का मंच बना दिया। इस मुकदमे ने न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ब्रिटिश शासन की नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।

