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बंगाल में ओवैसी-कबीर गठबंधन से सियासी हलचल, ममता के वोटबैंक पर संकट के आसार

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां असदुद्दीन ओवैसी ने आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अहम रणनीतिक कदम उठाया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने ऐलान किया है कि वह इस बार चुनाव हुमायूं कबीर की पार्टी ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ के साथ गठबंधन में लड़ेगी। इस फैसले ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है और खासतौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए इसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

यह गठबंधन केवल एक राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि सीधे तौर पर उस मुस्लिम वोटबैंक को प्रभावित करने की कोशिश माना जा रहा है, जो अब तक बड़े पैमाने पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पक्ष में एकजुट रहा है। पश्चिम बंगाल में करीब 27 से 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो कई सीटों पर चुनाव परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में ओवैसी और हुमायूं कबीर का साथ आना इस वोटबैंक में विभाजन की आशंका को बढ़ाता है।

हुमायूं कबीर, जो मुर्शिदाबाद क्षेत्र के प्रभावशाली नेता माने जाते हैं, ने अपनी पार्टी के जरिए चुनावी तैयारियों को तेज कर दिया है। उन्होंने 153 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि यह गठबंधन जमीनी स्तर पर मजबूती के साथ उतरने की तैयारी में है। खास बात यह है कि उन्होंने ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के क्षेत्र नंदीग्राम में भी उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असदुद्दीन ओवैसी को बंगाल में लंबे समय से एक मजबूत स्थानीय चेहरे की तलाश थी, जो अब हुमायूं कबीर के रूप में पूरी होती दिख रही है। ओवैसी की राष्ट्रीय पहचान और कबीर की स्थानीय पकड़ का यह मेल राज्य की कई अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर प्रभाव डाल सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और बड़ा पहलू यह है कि इससे भारतीय जनता पार्टी (BJP) को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। अगर मुस्लिम वोटों में बिखराव होता है, तो कई सीटों पर इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां मुकाबला पहले से ही कांटे का है।

कुल मिलाकर, ओवैसी-कबीर गठबंधन ने पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति किस हद तक असर डालती है और क्या यह वाकई राज्य के पारंपरिक वोट समीकरणों को बदल पाती है।

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