लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड की जांच में एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि जिस तीन मंजिला इमारत में आग लगने से 15 लोगों की मौत हुई, उसके खिलाफ लगभग 10 साल पहले अवैध निर्माण और व्यावसायिक उपयोग को लेकर कार्रवाई शुरू की गई थी। उस समय लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने भवन के अनधिकृत हिस्से को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया था, लेकिन बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया।
जानकारी के अनुसार, इमारत के मालिक ने वर्ष 2016 में प्राधिकरण के समक्ष अपील करते हुए दावा किया था कि ध्वस्तीकरण आदेश जारी करने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया। इसके बाद उसी अधिकारी ने, जिसने पहले ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था, कुछ ही महीनों में उसे निरस्त कर दिया। अब इस पूरे घटनाक्रम की जांच की जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में कार्रवाई रोकी गई थी।
अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित इस भवन का नक्शा मूल रूप से आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2014 में वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला के नाम संपत्ति का हस्तांतरण हुआ था। बाद में भवन का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए होने लगा। बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर पेट शॉप और क्लीनिक संचालित किए जा रहे थे, जबकि दूसरी मंजिल पर हेड हॉपर स्टूडियोज नामक एनिमेशन और गेम डेवलपमेंट कंपनी चल रही थी। इसी मंजिल पर आग का सबसे ज्यादा असर हुआ और अधिकांश मृतक वहीं कार्यरत थे।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2016 में एलडीए ने भवन का निरीक्षण कर पाया था कि इसका उपयोग स्वीकृत मानकों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इसके बाद अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई शुरू की गई थी, लेकिन ध्वस्तीकरण आदेश वापस होने के बाद वर्षों तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। अब एलडीए यह भी जांच कर रहा है कि आवासीय अनुमति होने के बावजूद भवन में लगातार व्यावसायिक गतिविधियां कैसे संचालित होती रहीं।
एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने बताया कि भवन को लेकर 15 दिन का ध्वस्तीकरण नोटिस जारी किया गया है। साथ ही उस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई की संस्तुति की गई है, जिसने पहले ध्वस्तीकरण का आदेश दिया और बाद में उसे निरस्त कर दिया था। एलडीए ने राज्य सरकार से संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी की है।
जांच में यह भी सामने आया है कि भवन के पास अग्नि सुरक्षा से संबंधित आवश्यक मंजूरी नहीं थी। हालांकि भवन मालिक का तर्क था कि इमारत की ऊंचाई निर्धारित सीमा के भीतर होने के कारण फायर एनओसी की आवश्यकता नहीं थी। बावजूद इसके, भवन में लंबे समय से चल रही व्यावसायिक गतिविधियों और सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
हादसे के बाद प्रदेश सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) ने घटनास्थल का निरीक्षण किया है और घायलों से भी बातचीत की है। अब तक मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग और एलडीए के चार अधिकारियों को निलंबित किया गया है।
इस बीच, राज्य सरकार ने सभी जिलों में बिना पंजीकरण संचालित कोचिंग संस्थानों के खिलाफ विशेष अभियान चलाने और सभी कोचिंग सेंटरों का सुरक्षा ऑडिट कराने के निर्देश दिए हैं। उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि छात्र सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा और सभी संस्थानों में भवन सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यापक जांच कराई जाएगी।
अलीगंज अग्निकांड ने न केवल सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर किया है, बल्कि यह भी सवाल खड़े कर दिए हैं कि वर्षों तक नियमों के विपरीत चल रही गतिविधियों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई। अब जांच एजेंसियां इस पूरे मामले में प्रशासनिक जिम्मेदारी और संभावित लापरवाही की भी पड़ताल कर रही हैं।

