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‘हर अभद्र शब्द अश्लील नहीं’— सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अभद्र भाषा और अश्लीलता के बीच स्पष्ट अंतर बताते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि हर अभद्र या अपमानजनक शब्द को स्वतः अश्लील नहीं माना जा सकता। किसी भी मामले में यह तय करने के लिए कि कोई टिप्पणी अश्लील है या नहीं, उसके संदर्भ, परिस्थितियों और प्रभाव को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि समाज में कई बार लोग गुस्से या आवेश में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर देते हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर हर मामले में अश्लीलता का अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभद्र भाषा और अश्लील अभिव्यक्ति दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं और दोनों का मूल्यांकन अलग-अलग आधार पर किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा ‘मां’ से जुड़ी गाली देने जैसी अभद्र भाषा का प्रयोग निंदनीय हो सकता है, लेकिन हर मामले में उसे स्वतः आपराधिक अश्लीलता नहीं माना जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में न्यायालय को संबंधित शब्दों के प्रयोग की परिस्थितियां, उनका उद्देश्य और उनके वास्तविक प्रभाव का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए।

अदालत की इस टिप्पणी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक कानून की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में अभद्र भाषा और अश्लीलता से जुड़े मामलों की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की अपमानजनक या असम्मानजनक भाषा का समर्थन नहीं किया जा सकता। अदालत की टिप्पणी का उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि हर अभद्र शब्द को कानून की नजर में स्वतः अश्लीलता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता और प्रत्येक मामले का फैसला उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

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