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लाल किले पर RSS के जिक्र से उपजा सियासी विवाद

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के बाद सियासी हलकों में हलचल मच गई है। उनके भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का जिक्र और उसकी प्रशंसा ने विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, को तीखी प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया है।

प्रधानमंत्री ने कहा की आज जब हम 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, मैं गर्व के साथ कहना चाहता हूँ कि 100 वर्ष पूर्व, एक संगठन का जन्म हुआ – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)। राष्ट्र की सेवा के 100 वर्ष एक गौरवपूर्ण, स्वर्णिम अध्याय हैं। ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के संकल्प के साथ, माँ भारती के कल्याण के उद्देश्य से, स्वयंसेवकों ने अपना जीवन मातृभूमि के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। एक तरह से, RSS दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है। इसका 100 वर्षों का समर्पण का इतिहास है।

यह संगठन अनुशासन, निस्वार्थ सेवा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक रहा है। मैं उन सभी स्वयंसेवकों को नमन करता हूँ, जिन्होंने पिछले 100 वर्षों में देश के निर्माण में अप्रतिम योगदान दिया है।

इस बयान पर कांग्रेस नेता और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ने कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा RSS ने 52 साल तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं दिया। बल्कि, उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। वे लोगों से आज़ाद हिंद फ़ौज के खिलाफ लड़ने के लिए ब्रिटिश सेना में शामिल होने का आग्रह कर रहे थे। इसलिए, उनका स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। उन्हें उन 52 सालों का हिसाब देना चाहिए। आप तिरंगे में विश्वास नहीं करते थे, संविधान में विश्वास नहीं करते थे। सरदार पटेल ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया थ

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब RSS की दया और सरसंघचालक मोहन भागवत के आशीर्वाद पर निर्भर हैं। लाल किले की प्राचीर से RSS का जिक्र करना उनकी हताशा भरी कोशिश है, ताकि वे संगठन को खुश कर सकें। 4 जून, 2024 की घटनाओं के बाद वे निर्णायक रूप से कमजोर हो चुके हैं और अब अपने कार्यकाल के विस्तार के लिए RSS पर निर्भर हैं।”

रमेश ने यह भी दावा किया कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर का इस तरह राजनीतिकरण करना देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बेहद हानिकारक है। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री आज थके हुए नजर आए। वे जल्द ही सेवानिवृत्त हो जाएंगे। लेकिन व्यक्तिगत और संगठनात्मक लाभ के लिए इस तरह का कदम उठाना ठीक नहीं है।”

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा की प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर सबसे परेशान करने वाला पहलू लाल किले की प्राचीर से RSS का नाम लेना था। यह एक संवैधानिक, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की भावना का घोर उल्लंघन है। यह उनके 75वें जन्मदिन से पहले RSS को खुश करने की हताश कोशिश है। ये लोग मुंह से स्वदेशी की बात करते हैं, लेकिन मन से विदेशी हैं।

अखिलेश ने RSS के इतिहास और उसके कथित रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह संगठन देश की एकता और धर्मनिरपेक्षता की भावना के खिलाफ काम करता रहा है।

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