आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने जहां लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं अब इसके दुरुपयोग से जुड़ी चिंताएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। खासतौर पर हेल्थकेयर सेक्टर में एआई के इस्तेमाल ने नई सुविधाएं दी हैं, लेकिन हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने इसके खतरनाक पहलुओं को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब एआई की मदद से ऐसे नकली एक्स-रे तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें पहचानना विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए भी मुश्किल हो रहा है।
मेडिकल जर्नल Radiology में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, एआई द्वारा बनाई गई एक्स-रे इमेज इतनी वास्तविक लगती हैं कि अनुभवी रेडियोलॉजिस्ट भी उनमें अंतर नहीं कर पा रहे हैं। इस रिसर्च में छह देशों के 12 अस्पतालों के 17 विशेषज्ञ डॉक्टरों को कुल 264 एक्स-रे इमेज दिखाई गईं, जिनमें से 132 असली और बाकी एआई जनरेटेड थीं। चौंकाने वाली बात यह रही कि डॉक्टर केवल करीब 40 प्रतिशत मामलों में ही सही पहचान कर सके कि कौन-सी इमेज नकली है।
इस अध्ययन में एडवांस एआई मॉडल्स जैसे GPT-4o को भी परखा गया, लेकिन उनकी पहचान क्षमता भी 57 से 85 प्रतिशत के बीच ही रही। यानी एआई खुद भी यह तय करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है कि कौन-सी इमेज असली है और कौन-सी नकली। इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीक अभी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है और इसके गलत इस्तेमाल की संभावना बनी हुई है।
दिल्ली के जीटीबी अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ. अजय राव के अनुसार, एआई स्वास्थ्य सेवाओं में मददगार जरूर है, लेकिन इसका दुरुपयोग गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। उन्होंने बताया कि लोग फर्जी एक्स-रे इमेज का इस्तेमाल मेडिकल क्लेम, छुट्टी लेने या गलत इलाज कराने के लिए कर सकते हैं। यदि किसी मरीज की फर्जी रिपोर्ट के आधार पर इलाज किया जाता है, तो इससे गलत डायग्नोसिस और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए एआई आधारित फेक इमेज डिटेक्शन टूल्स विकसित करना बेहद जरूरी है। साथ ही डॉक्टरों और रेडियोलॉजिस्ट को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे इस तरह की तकनीकों को पहचान सकें। आम लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है कि वे एआई से मेडिकल इमेज बनाने या उस पर भरोसा करने से बचें और किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए सीधे डॉक्टर से सलाह लें।
यह पूरा मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि एआई जितना शक्तिशाली है, उतना ही संवेदनशील भी है। सही उपयोग के साथ यह वरदान बन सकता है, लेकिन गलत हाथों में पड़कर यह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा भी साबित हो सकता है।

