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सुप्रीम कोर्ट से अब्बास अंसारी को बड़ी राहत, मामले पर स्टे दिया गया, हाईकोर्ट को जल्द सुनवाई का निर्देश

उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को लखनऊ के जियामऊ इलाके में विवादित भूमि पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्माण कार्य को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। इस भूमि पर गैंगस्टर-राजनेता मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी स्वामित्व का दावा कर रहे हैं।

गौरतलब है कि वर्ष 2020 में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने मुख्तार अंसारी और उनके परिवार के बंगले को गिरा दिया था। अब सरकार ने इस भूमि पर पीएम आवास योजना के अंतर्गत फ्लैट बनाने की योजना बनाई है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अब्बास अंसारी के वकील कपिल सिब्बल की दलीलों पर विचार किया। सिब्बल ने अदालत को बताया कि भूमि पर कब्जे से जुड़ी याचिका को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बार-बार सूचीबद्ध किया गया, लेकिन अब तक कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 21 अक्टूबर को उच्च न्यायालय को मामले पर शीघ्र सुनवाई का निर्देश दिया था।

जब गुरुवार को मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में आया, तो सिब्बल ने बताया कि उच्च न्यायालय ने अब तक इस पर सुनवाई नहीं की है। पीठ ने इस पर कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को इस मामले में अधिक सतर्क रहना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई तक स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए उच्च न्यायालय को शीघ्र सुनवाई करने के निर्देश दिए।

अब्बास अंसारी का दावा
याचिका में अब्बास अंसारी ने कहा कि उनके दादा ने जियामऊ में एक प्लॉट खरीदा था, जिसकी रजिस्ट्री 9 मार्च 2004 को हुई। उन्होंने यह संपत्ति अपनी पत्नी राबिया बेगम को उपहार में दी थी, जिन्होंने 2017 में इसे वसीयत के माध्यम से अब्बास और उनके भाई को सौंप दिया।

हालांकि, 14 अगस्त 2020 को एसडीएम डालीबाग, लखनऊ ने एकतरफा आदेश पारित कर इस भूमि को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया। इसके बाद अगस्त 2023 में अब्बास अंसारी और उनके भाई को इस जमीन से बेदखल कर दिया गया।

अब्बास अंसारी ने उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की, लेकिन उनकी याचिका पर अब तक कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने विवादित भूखंड पर कब्जा लेकर पीएम आवास योजना के तहत निर्माण शुरू कर दिया।

न्यायालय का आदेश
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर इस दौरान किसी तीसरे पक्ष को अधिकार दे दिए जाते हैं, तो याचिकाकर्ताओं को अपूरणीय क्षति हो सकती है। न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई तक भूमि पर यथास्थिति बनी रहे।

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